“मंज़िल की बातें बहुत हैं, रास्ता कोई बताता नहीं,
सवाल सबके दिल में हैं, मगर कोई उठाता नहीं।”
कभी-कभी समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ सब कुछ चलता हुआ तो लगता है, लेकिन दिशा को लेकर एक गहरी बेचैनी बनी रहती है। विकास के दावों, योजनाओं की घोषणाओं और आँकड़ों की चमक के बीच आम नागरिक के मन में कई अनकहे सवाल तैरते रहते हैं। व्यवस्थाएँ सक्रिय दिखती हैं, नीतियाँ बनती हैं, सरकारें बदलती हैं और बजट पेश होते हैं—फिर भी विकास की वास्तविक गति को लेकर असमंजस बना रहता है। सवाल यह नहीं कि प्रयास हो रहे हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उन प्रयासों का असर वर्तमान में कितना महसूस हो रहा है।
इसी बीच समाज का एक बड़ा वर्ग, खासतौर पर युवा, अपने भविष्य को लेकर द्वंद्व में दिखाई देता है। अवसरों की चर्चा बहुत है, लेकिन स्पष्ट दिशा की तलाश अभी भी जारी है। रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा आम नागरिक व्यवस्था से सवाल पूछने की आदत धीरे-धीरे खोता जा रहा है। वहीं मीडिया, जो कभी समाज का आईना माना जाता था, बदलते समय में अपनी भूमिका और पहचान को नए संदर्भों में परिभाषित करने की चुनौती से जूझ रहा है—जहाँ पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया के अनेक विकल्प सामने हैं।
युवा वर्ग आज अपने भविष्य की दिशा को लेकर गहरी चिंता में है। स्कूली शिक्षा से लेकर कॉलेज तक वह लगातार इस दुविधा में रहता है कि आगे का रास्ता नौकरी का हो या व्यवसाय का। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तेज़ रफ्तार प्रगति के बीच रोजगार की स्थिरता को लेकर आशंकाएँ भी बढ़ी हैं। आकर्षक पैकेज और चमकदार करियर के पीछे छिपे दबाव को देखकर कई युवा स्वयं को असमंजस की स्थिति में पाते हैं।
इधर व्यापार की दुनिया में भी तेज़ बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक ऑफलाइन व्यापार ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है, जबकि डिजिटल मंचों पर विकल्पों की अधिकता ने उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है।
महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की चिंता झेलता आम नागरिक भी इस परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विकसित भारत के दीर्घकालिक विज़न के साथ-साथ वर्तमान में शहरों की आधारभूत योजनाओं और सुविधाओं पर भी गंभीरता से विचार आवश्यक है। चुनावी मुद्दों और वादों की निरंतरता पर भी समय-समय पर समीक्षा होना स्वाभाविक है।
प्रशासनिक प्रयासों और जनसंपर्क की पहलें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव कितना है—यह भी विचारणीय प्रश्न है। योजनाओं की ज़मीनी स्थिति, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और आम नागरिक की सुनवाई—ये सभी विषय निरंतर संवाद की माँग करते हैं।
शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम एक समाज के रूप में पर्याप्त सवाल पूछ रहे हैं? सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे हर नागरिक के जीवन से जुड़े हैं। जब सवाल कम होते हैं, तो जवाबदेही भी कमजोर पड़ने लगती है।
समय की मांग है कि हम ठहरकर सोचें, विचार करें और अपने जीवन के निर्णयों में सजगता लाएँ। समझदारी से की गई बचत और जागरूक नागरिकता ही भविष्य की सच्ची पूँजी बन सकती है। आखिर, आज की सजगता ही कल की सुरक्षा है।

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