लो कर लो बात : यूपीआई शुल्क विवाद के बहाने सवाल भारत को अपना पेमेंट गेटवे और स्विफ्ट का विकल्प कब मिलेगा?

सम्पादकीय- लो कर लो बात 

संसद ने सोमवार, 10 अगस्त को 'कराधान और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2026' को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस विधेयक में विदेशी निवेश के नियमों, डिजिटल पेमेंट यानी यूपीआई-एमडीआर, कच्चे हीरे के व्यापार में छूट और आरईआईटी-इनविट्स पर टैक्स से जुड़े बदलाव शामिल हैं। लोकसभा पहले ही इसे मंजूरी दे चुकी थी, और चूंकि इसे धन विधेयक के तौर पर पेश किया गया था, इसलिए राज्यसभा ने संवैधानिक प्रक्रिया के तहत चर्चा के बाद इसे वापस लोकसभा भेज दिया। बस इतनी खबर फैली और आम आदमी को लगा कि अब यूपीआई पर भी चार्ज लगने वाला है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए साफ कर दिया कि इस कानून में यूपीआई पर किसी तरह के टैक्स या ट्रांजैक्शन चार्ज का कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने सदन में सीधे सवाल उठाकर खुद जवाब भी दिया, क्या उपभोक्ता को कोई यूपीआई चार्ज देना होगा, नहीं। उन्होंने बताया कि लॉन्च के समय से ही यूपीआई उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त रहा है और हर भारतीय बिना किसी ट्रांजैक्शन चार्ज के इस सुविधा का इस्तेमाल करता रहेगा। यानी व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाला लेनदेन, जैसे दूध वाले या दोस्त को पैसे भेजना, पहले की तरह फ्री रहेगा। विधेयक असल में एक इनेबलिंग प्रावधान भर है, जिसके तहत भविष्य में कुछ तय सीमा से ऊपर के बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर मामूली शुल्क लगाने का रास्ता खुला रहेगा, फैसला एनपीसीआई की अगुवाई वाली कमेटी करेगी।



सरकार यूपीआई मुफ्त रखने के लिए हर साल हजारों करोड़ की सब्सिडी बैंकों को देती है। पर उद्योग जगत में यह बात व्यापक रूप से कही जाती रही है कि फोनपे और गूगलपे जैसी कंपनियां यूपीआई से सीधे मुनाफा नहीं कमातीं, बल्कि उसी यूजर को लोन, बीमा और निवेश जैसे प्रोडक्ट बेचकर कमाई करती हैं। अगर यह सही है, तो लागत आम आदमी की जेब से ही किसी न किसी रूप में निकलती है, भले वह सीधे ट्रांजैक्शन पर न दिखे। इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं है, पर सरकार और आरबीआई को इस पर पारदर्शिता से आंकड़े रखने चाहिए।

वेबसाइट और सब्सक्रिप्शन जैसे कंप्यूटर आधारित भुगतान में भारत के पास यूपीआई जैसा कोई एक बड़ा, सरकार समर्थित गेटवे नहीं है। रेजरपे जैसी भारतीय कंपनी जरूर इस क्षेत्र में मजबूती से खड़ी है, पर कई कारोबारी अब भी स्ट्राइप जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर हैं, और गूगल, फेसबुक जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियां अपनी सब्सक्रिप्शन सेवाओं के लिए ज्यादातर वीजा-मास्टरकार्ड पर ही टिकी रहती हैं, जिससे हर लेनदेन पर विदेशी कार्ड नेटवर्क को फीस जाती है। अंतरराष्ट्रीय भुगतान संदेश व्यवस्था में भी भारत का अपना घरेलू ढांचा, जैसे आरबीआई की एसएफएमएस प्रणाली, अभी सीमित दायरे में है और स्विफ्ट जितने वैश्विक पैमाने का कोई भारतीय विकल्प अब तक खड़ा नहीं हो सका, हालांकि यूपीआई को कुछ देशों से जोड़ने के प्रयोग जरूर चल रहे हैं।

तीन सुझाव इस मौके पर जरूरी हैं। पहला, यूपीआई की तर्ज पर वेबसाइट और कंप्यूटर भुगतान के लिए एक मजबूत सरकारी या सरकार समर्थित पेमेंट गेटवे बने, जो भरतकोष जैसे सीमित सरकारी पोर्टल से कहीं आगे आम कारोबार तक पहुंचे, और रेजरपे जैसी घरेलू कंपनियों को भी बढ़ावा मिले। दूसरा, भारतीय ग्राहकों से पैसा लेने वाली हर विदेशी कंपनी के लिए भारत में पंजीकृत बैंकों से लेनदेन को प्रोत्साहित या अनिवार्य करने पर विचार हो। तीसरा, स्विफ्ट के समांतर अपना अंतरराष्ट्रीय भुगतान तंत्र बड़े पैमाने पर खड़ा करने पर काम तेज हो।

अब जब संसद ने विधेयक पारित कर दिया है और वित्त मंत्री ने सदन के भीतर सार्वजनिक रूप से यह भरोसा दिया है, तो यूपीआई मुफ्त बने रहने की बात सिर्फ सरकारी बयान नहीं, बल्कि संसदीय रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुकी है। पर असली सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि फोन पर मिली यह आजादी वेबसाइट, सब्सक्रिप्शन और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन तक कब पहुंचाई जाएगी। तभी असली मायने में लो कर लो बात कहने का हक बनता है।

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