"ऑपरेशन कमल — अब 'ऑपरेशन टाइगर' : लोकतंत्र की नई परिभाषा या पुरानी बीमारी का नया नाम?"

जून का महीना महाराष्ट्र की राजनीति के लिए अब सिर्फ कैलेंडर का एक पन्ना नहीं रह गया है। यह वह महीना बनता जा रहा है जब जनादेश की परिभाषाएँ बदल जाती हैं, पार्टियाँ टूट जाती हैं और मतदाता खुद से पूछने लगता है - "क्या मेरा वोट सचमुच मेरे प्रतिनिधि के साथ गया था, या रास्ते में कहीं खो गया?"

दो वर्ष पहले जून में महाराष्ट्र ने देखा था कि एक राजनीतिक दल दो हिस्सों में बंट गया। नाम बदला, चुनाव चिह्न बदला, निष्ठाएँ बदलीं। और अब फिर जून आया है। इस बार चर्चा छह सांसदों के दल बदलने की है।

सबसे अधिक चुभने वाली बात दल-बदल नहीं, बल्कि उसके बाद आया वह बयान है - "ऑपरेशन सफल रहा।"

लोकतंत्र में "ऑपरेशन" शब्द असहज करता है। क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती संवाद में है, सहमति में है, जनता के विश्वास में है। जब निर्वाचित प्रतिनिधियों के स्थानांतरण को "ऑपरेशन" कहा जाने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि राजनीति जनता के बीच हो रही है या सत्ता के गलियारों में।

यह संपादकीय किसी एक दल या व्यक्ति की आलोचना नहीं है। प्रश्न उससे बड़ा है।

भारत का लोकतंत्र बहुदलीय व्यवस्था पर खड़ा है। मतदाता केवल व्यक्ति को वोट नहीं देता, वह विचार, नीति, घोषणा-पत्र और राजनीतिक पहचान को भी वोट देता है। ऐसे में जब चुनाव के बाद वही प्रतिनिधि किसी दूसरी राजनीतिक धारा में खड़ा दिखाई देता है, तो सबसे बड़ा नुकसान विपक्ष या सत्ता का नहीं होता - सबसे बड़ा नुकसान मतदाता के विश्वास का होता है।

एक आम नागरिक के लिए राजनीति गणित नहीं होती। उसे 272, 352 या दो-तिहाई बहुमत के आंकड़ों से अधिक फर्क अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी से पड़ता है। उसे चिंता होती है महंगाई की, रोजगार की, किसानों की समस्याओं की, शिक्षा और स्वास्थ्य की। लेकिन अक्सर उसे लगता है कि सत्ता और विपक्ष दोनों का सबसे बड़ा समय एक-दूसरे के विधायकों और सांसदों की गिनती में बीत रहा है।

यहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना दिखाई देती है।

संसद और विधानसभाएँ जनता की आवाज़ बनने के लिए बनी थीं। लेकिन यदि राजनीति का केंद्र जनहित से हटकर केवल संख्या-बल बन जाए, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है।

दल-बदल विरोधी कानून इसी चिंता से पैदा हुआ था। उद्देश्य था कि जनादेश की रक्षा हो। लेकिन समय के साथ राजनीति ने कानून की सीमाओं के भीतर रहकर भी उसके उद्देश्य को चुनौती देने के रास्ते खोज लिए। परिणाम यह हुआ कि कानून मौजूद है, लेकिन मतदाता का प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।

मैंने जिसे चुना था या जो विचारधारा मैने चुनी थी, वह आज कहाँ है?

यह प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है। यह प्रश्न हर उस राज्य का है जहाँ चुनाव के बाद राजनीतिक निष्ठाएँ बदलती हैं। यह प्रश्न हर उस मतदाता का है जिसने लोकतंत्र पर भरोसा करके मतदान केंद्र तक जाने का कष्ट उठाया।

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र चुनाव के बाद भी जनता के विश्वास को निभाने का नाम है।

यदि राजनीति का सबसे बड़ा उत्सव "ऑपरेशन सफल रहा" बन जाए, तो शायद हमें रुककर यह भी पूछना चाहिए कि जनता के सपनों का क्या हुआ? बेरोजगार युवा का क्या हुआ? किसान की उम्मीदों का क्या हुआ? महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य का क्या हुआ?

क्योंकि अंततः इतिहास यह याद नहीं रखता कि किसने कितने सांसद जोड़े थे।

इतिहास यह याद रखता है कि किसने जनता का विश्वास बचाया था।

और लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद की संख्या नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है।

पिछले कुछ दिनों से AAP - DMK - TMC जेसी पार्टियों ने अपना श्रेत्र खोया है, अब इनकी वापसी पर सदेश जरुर है साथ ही अब आगामी सदन में इसका परिणाम जल्द दिखेगा - 2/3 बहुतमत होते ही सरकार महिला आरक्षण सहित - परिसीमन बिल आसानी से पास करा सकेगी . 

कांग्रेस के पास मोका 29 का बीजेपी के पास 47 का ?

हालिया में हुए चुनाव और दल बदल ने  केन्द्र मे प्रमुख 2 पार्टियों के लिए अपने अपने अवसर खोल दिए है , जहा कांग्रेस को बिना कुछ करे अपनी पुरानी जमीन वापस पाने का मोका मिल रहा है पर भितरघात कही छुपी नही 

आगामी चुनाव निर्णायक होंगे गोवा ( AAP ) - यूपी ( BSP / SP ) - मणिपुर ( BJP ), पंजाब ( AAP ), उत्तराखण्ड ( BJP ), अब कांग्रेस के लिए जीत या बाहर .

बंगाल में प्रचण्ड जीत के बाद अब पंजाब बीजेपी के लिए बड़ी चुनोती रहेगा - पर जेसे की मैने कहा केन्द्र में बैठी जोड़ी ने 2024 की हार से सबक लिया है और AAP में भरी सेंध से इसका असर भी देख रहा है , आखिर बीजेपी के पास पूरा कैडर मोजूद है और लक्ष्य साफ़ 

बाकी आप अपनी राय जरुर दे . 

Post a Comment

0 Comments