अरावली की गोद में बसा अजमेर केवल ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिहाज से भी एक विशिष्ट पहचान रखता है। शहर को चारों ओर से घेरे अरावली की पहाड़ियां अजमेर के लिए किसी संकटमोचक से कम नहीं हैं। ये पहाड़ियां गर्म और धूलभरी हवाओं को रोकने, कठोर जलवायु के प्रभाव को कम करने तथा भूजल संरक्षण में अहम भूमिका निभाती हैं।
अजमेर-पुष्कर मार्ग पर स्थित तारागढ़, नाग पहाड़, हाथी पहाड़ सहित आसपास की अनेक छोटी-बड़ी पहाड़ियां प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती हैं। मानसून के दौरान यही पहाड़ियां वर्षा जल को संचित कर भूजल स्तर को पुनर्जीवित करती हैं। यही कारण है कि अरावली क्षेत्र में हरियाली, औषधीय वनस्पतियां और जैव विविधता आज भी किसी हद तक सुरक्षित है।
पर्यावरण, संस्कृति और आस्था का संगम
अरावली की पहाड़ियां केवल भौगोलिक संरचना नहीं हैं, बल्कि अजमेर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी आधार हैं। सावित्री माता, नाग पहाड़, तारागढ़ जैसे धार्मिक और पर्यटन स्थल इन पहाड़ियों पर स्थित हैं, जो न केवल श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी संबल प्रदान करते हैं। इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां प्रकृति की अमूल्य देन हैं, जिनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
अरावली पर संकट के बादल
हाल के वर्षों में अरावली क्षेत्र में अतिक्रमण, अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों में तेजी आई है। कई स्थानों पर पहाड़ियों को काटकर मकान, दुकानें और सड़कें बनाई जा रही हैं। रात-दिन भारी मशीनों से हो रहा खनन न केवल पहाड़ियों की संरचना को कमजोर कर रहा है, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन को भी जन्म दे रहा है।
अरावली की परिभाषा को लेकर हालिया कानूनी बहस ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। यदि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर किया जाता है, तो इसका सीधा लाभ अवैध गतिविधियों को मिलेगा। हालांकि, इस पर पुनर्विचार की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन तब तक नुकसान की आशंका बनी हुई है।
भविष्य की चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि अजमेर का संतुलित मौसम, वर्षा प्रणाली और भूजल स्तर अरावली श्रृंखला पर निर्भर करता है। यदि इन पहाड़ियों का संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहर को जल संकट, बढ़ते तापमान और हरियाली के अभाव जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ेगा।
संरक्षण ही समाधान
अब समय आ गया है कि अरावली की पहाड़ियों को केवल जमीन के टुकड़े के रूप में नहीं, बल्कि जीवनदायिनी धरोहर के रूप में देखा जाए। सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर अवैध खनन और अतिक्रमण पर सख्ती से रोक लगानी होगी। साथ ही, जनभागीदारी के माध्यम से संरक्षण और संवर्धन की ठोस नीति अपनानी होगी।
अरावली की रक्षा करना केवल प्रकृति को बचाना नहीं है, बल्कि अजमेर के भविष्य को सुरक्षित करना है। यदि आज कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।
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