प्रेस कॉन्फ़्रेंस से प्रेस ब्रीफिंग तक — जवाबदेही से दूरी का नया प्रयोग




 लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में मीडिया और सत्ता के बीच संवाद हमेशा जनहित का सबसे अहम माध्यम रहा है। लेकिन आज जिस तरह से सरकार के प्रतिनिधि पारंपरिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को छोड़कर प्रेस ब्रीफिंग को नया चलन बना रहे हैं, वह केवल एक 'मार्केटिंग रणनीति' नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता से एक योजनाबद्ध दूरी का संकेत प्रतीत होती है।


पहले प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकारों को सवाल पूछने, उनके जवाब मांगने और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर सीधा संवाद करने का अधिकार रहता था। वहीं अब प्रेस ब्रीफिंग नामक यह नया प्रारूप महज़ एकतरफ़ा सूचना वितरण का माध्यम बनकर रह गया है। प्रवक्ता आते हैं, लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, कुछ विशेष चैनलों या डिजिटल माध्यमों पर वही क्लिप प्रसारित होती है — और फिर बिना किसी सवाल-जवाब के मंच समाप्त। यह तरीका पत्रकारिता की आत्मा पर सीधा प्रहार है।


कहा जा सकता है कि ‘ब्रीफिंग’ आधुनिक दौर के ‘स्पिन डॉक्टरिंग’ का साधन बनती जा रही है — जहाँ सूचना से अधिक महत्व ‘इमेज’ का होता है, और सच्चाई से ज़्यादा मूल्यांकन ‘ब्रांडिंग’ का। सरकारी प्रतिनिधि अब उत्तरदायित्व से बचने के लिए चुने हुए तथ्यों की ही व्याख्या कर रहे हैं, पर कठिन सवालों से बचने की यह प्रवृत्ति नागरिकों के अधिकारों को कमजोर करती है।


आज जब पूरा मीडिया इकोसिस्टम डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, सरकार की यह कोशिश कि संवाद को नियंत्रित किया जाए, बेहद खतरनाक संकेत है। लोकतंत्र में सूचना पर नियंत्रण सत्ता को आराम देता है, पर जनता को अंधेरे में रखता है।


अब समय आ गया है कि पत्रकार संगठन और मीडिया संस्थान इस बदलाव पर खुली बहस छेड़ें। क्योंकि अगर प्रेस कॉन्फ़्रेंस को प्रेस ब्रीफिंग से पूरी तरह बदला गया, तो लोकतंत्र में पारदर्शिता का आख़िरी दरवाज़ा भी बंद हो जाएगा।

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